➤ मानसून सत्र के अंतिम दिन 92 सवालों पर सरकार से जवाब मांगे गए
➤ ओपीएस पर सुक्खू का भरोसा, जयराम ने कर्मचारी-पेंशनर आंदोलनों पर घेरा
➤ ब्यास-खड्डों की ड्रेजिंग से बाढ़ का खतरा घटाने और राजस्व जुटाने की योजना
शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र की दसवीं और अंतिम बैठक गुरुवार को प्रश्नकाल के साथ शुरू हुई। सत्र के आखिरी दिन सदन में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, सरकारी भर्तियों, आपदा राहत, कर्मचारियों और पेंशनरों से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उठे। विधायकों ने अलग-अलग विभागों से संबंधित कुल 92 सवाल सरकार के सामने रखे। इनमें 50 तारांकित प्रश्न थे, जिनके जवाब संबंधित मंत्रियों ने सदन में मौखिक रूप से दिए, जबकि 42 अतारांकित प्रश्नों के जवाब लिखित रूप में सदन के पटल पर रखे गए।
अंतिम दिन सबसे ज्यादा चर्चा पुरानी पेंशन योजना (OPS), कर्मचारियों के लंबित भुगतान, आपदा राहत के लिए मिलने वाली धनराशि और ब्यास नदी व सहायक खड्डों में ड्रेजिंग के मुद्दे पर हुई। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने सदन में कहा कि प्रदेश के सभी पात्र कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना का लाभ दिया जाएगा। वहीं, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने सरकार के कर्मचारी हितैषी होने के दावे पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर सरकार ने ओपीएस लागू कर दी है तो कर्मचारी और पेंशनर सड़कों पर धरना-प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं।
बचे सभी पात्र कर्मचारियों को मिलेगा ओपीएस का लाभ: सुक्खू
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने सदन में कहा कि प्रदेश में पुरानी पेंशन योजना का लाभ सभी बचे हुए पात्र कर्मचारियों को दिया जाएगा। उन्होंने कर्मचारियों के लंबित वित्तीय भुगतान के मुद्दे पर सरकार की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि जब वर्तमान सरकार ने सत्ता संभाली थी, उस समय प्रदेश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि 67 वर्ष से अधिक आयु के सभी कर्मचारियों के लंबित भुगतान किए जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि सरकार अपनी ओर से कर्मचारियों के हितों को लेकर प्रयास कर रही है, लेकिन प्रदेश की आर्थिक स्थिति और केंद्र से मिलने वाली सहायता का भी इस पर असर पड़ता है।
सुक्खू ने कहा कि यदि केंद्र सरकार से आपदा के लिए अपेक्षित राशि प्राप्त हो जाती, प्रधानमंत्री की ओर से घोषित 1500 करोड़ रुपये की सहायता मिल जाती और राजस्व घाटा अनुदान बंद नहीं होता, तो कर्मचारियों के अन्य लंबित भुगतान भी पूरे किए जा सकते थे।
इस बयान के बाद सदन में कर्मचारी और पेंशनर हितों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई।
जयराम ठाकुर ने पूछा- कर्मचारी और पेंशनर धरने पर क्यों?
मुख्यमंत्री के बयान पर अनुपूरक सवाल करते हुए नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने सरकार को घेरा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार वास्तव में कर्मचारी हितैषी है तो कर्मचारी और पेंशनर लगातार धरने और आंदोलन क्यों कर रहे हैं।
जयराम ठाकुर ने आपदा के लिए मिली धनराशि के इस्तेमाल को लेकर भी सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। उन्होंने बिजली बोर्ड कर्मचारियों के ओपीएस आंदोलन का जिक्र करते हुए सवाल किया कि यदि सरकार ने पुरानी पेंशन योजना लागू कर दी है तो बिजली बोर्ड के कर्मचारी इसके लिए आंदोलन करने को मजबूर क्यों हैं।
इस मुद्दे पर सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। विपक्ष ने कर्मचारियों के लंबित भुगतान और पेंशन से जुड़े मामलों को सरकार के सामने चुनौती के रूप में रखा, जबकि सरकार ने आर्थिक परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों का हवाला दिया।
ब्यास नदी और सहायक खड्डों की ड्रेजिंग का भी उठा मुद्दा
मानसून सत्र के अंतिम दिन कुल्लू जिले से होकर बहने वाली ब्यास नदी और बंजार विधानसभा क्षेत्र की सहायक खड्डों में ड्रेजिंग और माइनिंग का मामला भी सदन में उठा। भाजपा विधायक सुरेंद्र शौरी ने सरकार से इस संबंध में अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी।
जवाब में मुख्यमंत्री सुक्खू ने बताया कि नदियों में ड्रेजिंग के लिए उद्योग विभाग से अनुमति हासिल करने में काफी प्रयास करने पड़े हैं। उन्होंने कहा कि माइनिंग विभाग से भी अनुमति मिल चुकी है, जबकि अब भारत सरकार की स्वीकृति आवश्यक है।
सरकार का मानना है कि नदियों और खड्डों से सिल्ट, पत्थर तथा अन्य जमा सामग्री को हटाने से एक तरफ बाढ़ के जोखिम को कम किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर निकाली गई सामग्री की नीलामी के जरिए प्रदेश को राजस्व भी प्राप्त हो सकता है।
ड्रेजिंग से निकलने वाली सामग्री से सरकार को आय की उम्मीद
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि ड्रेजिंग से निकलने वाली सामग्री के व्यवस्थित उपयोग से प्रदेश की आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
सरकार की ओर से इस दिशा में अलग विभाग बनाने पर भी विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य नदियों में जमा सामग्री को वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से हटाने के साथ-साथ उससे जुड़े आर्थिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है।
यह पहल विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां मानसून के दौरान नदियों और खड्डों में सिल्ट, पत्थर और अन्य सामग्री जमा होने से जल प्रवाह प्रभावित होता है तथा बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
अब तक 74 हजार मीट्रिक टन सामग्री उठाई गई
उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने ड्रेजिंग और माइनिंग से जुड़े सवाल के जवाब में बताया कि अब तक करीब 74 हजार मीट्रिक टन पत्थर उठाया जा चुका है और इसकी रॉयल्टी सरकारी खजाने में जमा कराई गई है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ड्रेजिंग के लिए फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट (FCA) की अनुमति आवश्यक नहीं है। ड्रेजिंग के बाद निकाली गई सामग्री को एक तरफ रखकर उसकी नीलामी की जा सकती है।
मंत्री ने बताया कि कैबिनेट के निर्णय के बाद ड्रेजिंग और माइनिंग से संबंधित काम वन विभाग और वन निगम को सौंपा गया है। इससे संबंधित प्रक्रिया के तहत अब तक बड़ी मात्रा में सामग्री हटाई जा चुकी है।
ड्रेजिंग सामग्री का 100 फीसदी हिस्सा उपयोगी नहीं
उद्योग मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि ड्रेजिंग से निकलने वाली सामग्री का 100 प्रतिशत हिस्सा उपयोग के योग्य नहीं होता। इसलिए नदी से निकाली गई प्रत्येक सामग्री को सीधे निर्माण या अन्य कार्यों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि सामग्री की गुणवत्ता और उपयोगिता के आधार पर उसका इस्तेमाल या नीलामी की जाएगी। सरकार का उद्देश्य इससे मिलने वाले संभावित राजस्व और बाढ़ नियंत्रण, दोनों पहलुओं को साथ लेकर आगे बढ़ना है।
मंत्री के अनुसार ड्रेजिंग का खर्च संबंधित हाइड्रो पावर कंपनी को उठाना होगा, जबकि सरकार ड्रेजिंग से निकलने वाली सामग्री की नीलामी कर सकती है। इस व्यवस्था से एक तरफ संबंधित कंपनियों पर ड्रेजिंग का वित्तीय भार रहेगा और दूसरी ओर सरकार को सामग्री से राजस्व प्राप्त हो सकेगा।
ब्यास की ड्रेजिंग से दोहरा फायदा लेने की तैयारी
सरकार की योजना में ब्यास नदी और उसकी सहायक खड्डों की ड्रेजिंग को केवल बाढ़ नियंत्रण के उपाय के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसके जरिए नदी तल में जमा सामग्री को हटाकर जल प्रवाह बेहतर करने और साथ ही उपयोगी सामग्री की नीलामी से राजस्व जुटाने की संभावना भी तलाशी जा रही है।
हालांकि, ड्रेजिंग से जुड़ी प्रक्रिया में पर्यावरणीय और तकनीकी पहलुओं का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण होगा। सरकार की ओर से अनुमति प्रक्रिया और विभागीय जिम्मेदारियों को लेकर सदन में जानकारी दी गई है।
रोजगार और अन्य मुद्दों पर भी हुई चर्चा
मानसून सत्र के अंतिम दिन कर्मचारियों और पेंशनरों के साथ-साथ सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, सरकारी भर्तियों और आपदा राहत जैसे मुद्दे भी विधायकों के सवालों में शामिल रहे। इस तरह अंतिम बैठक में प्रदेश से जुड़े कई अहम विषय सदन के सामने आए।
एक ओर सरकार ने ओपीएस और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर अपने फैसलों और भविष्य की योजनाओं का पक्ष रखा, तो दूसरी ओर विपक्ष ने कर्मचारियों के लंबित भुगतान, पेंशन और सरकार की गारंटियों को लेकर सवाल उठाए।
इससे पहले सरकार की ओर से सदन में यह भी कहा गया कि दिसंबर 2026 तक प्रदेश में 18 हजार सरकारी नौकरियां दी जाएंगी और पांच साल में एक लाख सरकारी नौकरियों का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में सरकार आगे बढ़ रही है।
रोजगार और गारंटियों को लेकर विपक्ष का वॉकआउट
सदन में बेरोजगारों के साथ कथित अन्याय और चुनावी गारंटियों को लेकर भी विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधा। इन मुद्दों पर विरोध जताते हुए विपक्ष ने सदन से वॉकआउट किया।
इस तरह हिमाचल विधानसभा का मानसून सत्र अंतिम दिन भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और जनहित से जुड़े सवालों से गरमाया रहा। कर्मचारियों के भुगतान और ओपीएस से लेकर ब्यास नदी की ड्रेजिंग और प्रदेश की आर्थिक स्थिति तक कई महत्वपूर्ण विषयों पर सरकार को जवाब देना पड़ा।



